जेन स्ट्रीट के बाहर जाने से ट्रेडर्स क्यों हुए निराश? बाजार से एक 'बड़ा खिलाड़ी' हटने का क्या है मतलब?

जेन स्ट्रीट के बाहर जाने से ट्रेडर्स क्यों हुए निराश? बाजार से एक 'बड़ा खिलाड़ी' हटने का क्या है मतलब?



बाजार नियामक सेबी (SEBI) द्वारा 3 जुलाई को जेन स्ट्रीट (Jane Street) पर प्रतिबंध लगाने के बाद, इंडियन मार्केट में ट्रेडिंग करने पर इस कंपनी के ग्रुप पर रोक लग गई है। सेबी ने अंतरिम आदेश में जेन स्ट्रीट को ₹4000 करोड़ से अधिक की राशि एस्क्रो अकाउंट में जमा करने को कहा था, जिसका पालन कंपनी ने कर दिया है। इस पूरे घटनाक्रम का असर स्टॉक मार्केट पर पड़ा है, खास तौर पर डेरिवेटिव (F&O) सेगमेंट में कारोबार का टर्नओवर काफी घट गया है। लेकिन, सवाल यह है कि एक कंपनी के बाहर जाने से ट्रेडर्स इतने निराश क्यों हैं?


डेरिवेटिव्स मार्केट का गणित

जेन स्ट्रीट, ऑप्शंस सेगमेंट की एक बहुत बड़ी खिलाड़ी थी। इसके मालिकाना (proprietary) ट्रेड्स का डेरिवेटिव सेगमेंट के कुल टर्नओवर में एक बड़ा हिस्सा था। लेकिन, यह केवल वॉल्यूम का मामला नहीं है। एक प्रोफेशनल ट्रेडर के लिए मुनाफा कमाने के दो सबसे महत्वपूर्ण पहलू होते हैं: कम बिड/ऑफर स्प्रेड (Bid/Offer Spread) और कम इम्पैक्ट कॉस्ट (Impact Cost)। जब जेन स्ट्रीट सक्रिय थी, तो ये दोनों कारक ट्रेडर्स के पक्ष में थे।


1. बिड/ऑफर स्प्रेड (Bid/Offer Spread):

इसे एक उदाहरण से समझते हैं। जब आप विदेश यात्रा के लिए विदेशी मुद्रा खरीदने बैंक जाते हैं, तो बैंक आपको दो दरें दिखाता है: एक जिस पर वह आपसे विदेशी मुद्रा खरीदेगा (कम दर) और दूसरी जिस पर वह आपको बेचेगा (ज्यादा दर)। इन दोनों कीमतों के बीच के अंतर को 'स्प्रेड' कहा जाता है, जो बैंक का प्रॉफिट मार्जिन होता है।


स्टॉक ट्रेडिंग में भी यही नियम लागू होता है। 'बिड' वह कीमत है जिस पर एक खरीदार किसी शेयर को खरीदने के लिए तैयार है, और 'ऑफर' वह कीमत है जिस पर एक विक्रेता उसे बेचने के लिए तैयार है। इन दोनों के बीच का अंतर ही स्प्रेड है। स्प्रेड जितना कम होता है, ट्रेडर्स की लागत उतनी ही कम होती है, जिससे उनका शुद्ध मुनाफा (take-home profit) बढ़ता है। जेन स्ट्रीट की मौजूदगी में, बड़ी मात्रा में ट्रेडिंग के कारण यह स्प्रेड बहुत कम रहता था, जिससे ट्रेडर्स के लिए प्रॉफिट कमाना आसान हो जाता था।


2. इम्पैक्ट कॉस्ट (Impact Cost):

इम्पैक्ट कॉस्ट का मतलब है कि जब कोई बड़ा खरीदार या विक्रेता बड़ी मात्रा में ऑर्डर देता है, तो उसकी वजह से कीमत में होने वाला बदलाव। मान लीजिए, एक खरीदार किसी शेयर के 5 लॉट ₹110 पर खरीदना चाहता है, लेकिन अगले 5 लॉट की कीमत ₹109.50 है। अगर वह पूरा ऑर्डर एक साथ देता है, तो उसकी औसत कीमत ₹110 से कम हो जाएगी। इम्पैक्ट कॉस्ट वह कीमत है जो ट्रेडर को अपनी पसंदीदा कीमत से अलग कीमत पर ट्रेड करने के लिए चुकानी पड़ती है।


जब जेन स्ट्रीट जैसी बड़ी ट्रेडिंग फर्म सक्रिय होती है, तो वह बड़ी मात्रा में लिक्विडिटी (तरलता) प्रदान करती है। इससे मार्केट में एंट्री और एग्जिट करना आसान हो जाता है, और बड़े ऑर्डर्स भी बिना कीमत में ज्यादा बदलाव के एग्जीक्यूट हो जाते हैं, जिससे इम्पैक्ट कॉस्ट कम रहती है।


निष्कर्ष: ट्रेडर्स की निराशा का कारण

जेन स्ट्रीट के मार्केट से बाहर जाने के बाद, ऑप्शंस सेगमेंट में लिक्विडिटी कम हो गई है। इससे बिड/ऑफर स्प्रेड बढ़ गया है और इम्पैक्ट कॉस्ट भी बढ़ गई है। इसका सीधा असर ट्रेडर्स के शुद्ध मुनाफे पर पड़ रहा है। यही वजह है कि ट्रेडर्स निराश हैं और उन्होंने अपने ट्रेड के साइज को घटा दिया है। एक 'बड़ा खिलाड़ी' जो बाजार को तरल और कुशल बनाए रखता था, उसके हटने से ट्रेडिंग का पूरा माहौल बदल गया है।

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