NSE IPO में क्यों लग रही है देर? सेबी की मंजूरी में 'को-लोकेशन' और टेक्नोलॉजी बनीं बड़ी बाधाएं

NSE IPO में क्यों लग रही है देर? सेबी की मंजूरी में 'को-लोकेशन' और टेक्नोलॉजी बनीं बड़ी बाधाएं



निवेशक लंबे समय से देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के बहुप्रतीक्षित आईपीओ का इंतजार कर रहे हैं। अनलिस्टेड मार्केट में एनएसई के शेयरों में तेजी भी देखी जा रही है, जो लिस्टिंग की संभावना को बढ़ाती है। हालांकि, मार्केट रेगुलेटर सेबी (SEBI) जब तक पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो जाता, वह एनएसई के आईपीओ को हरी झंडी नहीं देगा। इस देरी के पीछे कई जटिल कारण हैं, जिनमें प्रमुख है कुख्यात 'को-लोकेशन' मामला और टेक्नोलॉजी से जुड़ी चिंताएं।


एनएसई ने पहली बार दिसंबर 2016 में सेबी को आईपीओ के लिए आवेदन दिया था। लेकिन, मई 2017 में सेबी ने इस आईपीओ पर रोक लगा दी और 2019 में एनएसई का आवेदन वापस कर दिया। सेबी ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि को-लोकेशन मामले के समाधान के बाद ही नए आवेदन पर विचार किया जाएगा। तब से, एनएसई कई बार सेबी की मंजूरी हासिल करने की कोशिश कर चुका है, जिसमें इस साल 28 मार्च को किया गया ताजा संपर्क भी शामिल है।


को-लोकेशन विवाद: एक लंबी कानूनी लड़ाई

एनएसई के आईपीओ में देरी का सबसे बड़ा कारण को-लोकेशन मामला है। इस विवाद में आरोप हैं कि एनएसई ने कुछ ब्रोकरेज फर्मों को अपनी हाई-स्पीड को-लोकेशन सुविधाओं तक अनुचित और तरजीही पहुंच प्रदान की, जिससे उन्हें अन्य बाजार प्रतिभागियों पर अनुचित लाभ मिला। सीबीआई (CBI) और आयकर विभाग (Income Tax Department) के साथ-साथ सेबी भी इस मामले की गहन जांच कर रहे हैं। 


सितंबर 2024 में, सेबी ने पर्याप्त सबूतों की कमी का हवाला देते हुए एनएसई और उसके कुछ पूर्व शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ को-लोकेशन मामले में अपनी कार्यवाही बंद कर दी थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में अभी भी कुछ संबंधित मामले लंबित हैं। सेबी का कहना है कि जब तक सभी कानूनी कार्यवाही हल नहीं हो जातीं या एनएसई 'कंसेंट रूट' (Consent Route) के जरिए मामले का निपटारा नहीं कर लेता, तब तक IPO की राह आसान नहीं होगी। सेबी यह भी चाहता है कि एनएसई अपने ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) में को-लोकेशन और अन्य लंबित कानूनी कार्यवाही से संबंधित सभी आकस्मिक देनदारियों का खुलासा करे ताकि निवेशक पूरी तरह से सूचित रहें।


टेक्नोलॉजी और गवर्नेंस पर सेबी की चिंताएं

को-लोकेशन के अलावा, सेबी को एनएसई के टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर भी गंभीर चिंताएं हैं। नियामक बार-बार होने वाली तकनीकी गड़बड़ियों से परेशान है और जानना चाहता है कि एनएसई इन गड़बड़ियों को दूर करने और अपनी प्रणालियों को मजबूत करने के लिए क्या कदम उठा रहा है।


इसके अलावा, सेबी कॉर्पोरेट गवर्नेंस से जुड़े मसलों का समाधान भी चाहता है। सेबी का यह भी मानना है कि क्लियरिंग फर्मों (Clearing Firms) को स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए, और उसने एनएसई को अपनी क्लियरिंग इकाई के आर्थिक ढांचे की समीक्षा करने का सुझाव दिया है। नियामक एनएसई में एक पूर्णकालिक बोर्ड चेयरमैन की नियुक्ति के भी पक्ष में है, जो मजबूत गवर्नेंस सुनिश्चित कर सके।


विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इन प्रमुख मसलों — विशेषकर को-लोकेशन विवाद का अंतिम समाधान, टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार और कॉर्पोरेट गवर्नेंस की चिंताओं को दूर नहीं किया जाता — सेबी द्वारा एनएसई के आईपीओ को मंजूरी मिलने की संभावना कम है। हालांकि, एनएसई भी इन मसलों का जल्द समाधान चाहता है ताकि वह जल्द से जल्द बाजार में अपनी लिस्टिंग करा सके और निवेशकों को एक बड़ा अवसर मिल सके।


क्या एनएसई इन बाधाओं को पार कर पाएगा और भारत के सबसे बड़े आईपीओ में से एक बन पाएगा? यह देखने के लिए बाजार को अभी और इंतजार करना होगा।

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